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कविता आसमान को फाड़ दिया_sankalp

कविता
।।आसमान को फाड़ दिया।।
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ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

अपनी आबादी पर कभी
नियंत्रण नही  कर पाये
वन पहाड़ नदियों तक
शहरों के जाल बिछाये
थोड़े से स्वार्थ खातिर
अपनो को न प्यार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

अपने होते कौन हैं
नहीं कभी सोचा तुमने
जो देता जल जीवन वायु
उसे नहीं समझा तुमने।
प्रकृति के सीने पर तूने
निर्दयता से प्रहार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

आज आफत में दुनिया है
मौत के बादल छाये हैं
जिसे समझते तुम अपने
ये अपने नहीं पराये हैं।
जीवन रक्षक पालनहार
को नही स्वीकार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।

मौत के बेरहम तांडव से
अब जग को बचाना होगा
पेड़ काटना छोड़कर
केवल पेड़ लगाना होगा।
दुनिया हो जायेगी सुंदर
अगर फुलवारी तैयार किया।
ले हाथ मे कुल्हाड़ी
हरियाली उजाड़ दिया।
पेड़ों पर जो वार किया
आसमान को फाड़ दिया।।
----श्रीराम रॉय, शिक्षक,अमझर, मयूरहण्ड ----

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