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आज भी जीवंत है 80 वर्षो से चलती आ रही परंपरा माता रानी के नाम से ही बना है तालाब आकाश सिंह मयूरहंड : नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्रा विजय दशमी के आगमन के साथ ही समाप्त हो जाता है। जहां लोग विजय दशमी का पर्व धूमधाम से मनाते है। वही माता रानी की विदाई में आँखे नम हो जाती है। नौ दिन साथ रहने के बाद माता की विदाई करने का पल काफी दुखदायी होता है। प्रखंड मुख्यालय स्थित दुर्गा पूजा समिति के द्वारा माता रानी के प्रतिमा का विसर्जन एक अद्भुत परम्परा के साथ किया जाता है। जिसे देखने आसपास के दर्जनों गांवो से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। भक्त माता रानी का विसर्जन अपने कंधों के सहारे करते है। माता रानी के प्रतिमा को कंधे लगाने को लेकर सभी ललाहित रहते है। माता रानी को कंधे पर विसर्जन को लेकर चलने की परंपरा 80 वर्ष पुरानी है। यह परंपरा वर्ष 1941 से चली आ रही है। जो आज भी पूरे भक्ति भाव के साथ चला आ रहा है। बूढ़े बुर्जुगों का मानना है कि माता रानी के प्रतिमा को कंधे लगाने से साथ ही सभी तरह के दुख दूर हो जाते है। वही मन से मांगी मुराद भी अवश्य पूर्ण होते है। भक्त माता रानी को दशमी में अपराह्न 12 बजे अपने कंधे पर लेकर लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी तय कर वर्षो पूर्व बने चबूतरे पर स्थापित किया जाता है। विसर्जन को लेकर सभी महिलाएं प्रतिमा के पीछे पीछे पारंपरिक गीतों को गाते हुए प्रतिमा के पीछे पीछे चली है। प्रतिमा विसर्जन का दृश्य देखकर ऐसा लगता है जैसे सभी महिलाएं अपनी पुत्री की विदाई कर रही हों। प्रतिमा विसर्जन का समय बड़ा दुखभरा होता है। जहां सभी की आँखे नम हो जाती है। भक्त माता की प्रतिमा को निहारते नही थकते है। बताते चले कि पूर्वजो ने माता रानी के विसर्जन को लेकर एक तालाब का भी निर्माण किया था। जिसका नाम काली पोखर रखा गया था। उस तालाब में वर्षो से केवल माँ दुर्गा की ही प्रतिमा विसर्जित की जाती है। प्रतिमा विसर्जन से पहले माता की आरती उतारी जाती है। जहां सभी पुरुष व महिला बड़ी संख्या में भाग लेते है। सभी माता का जयकारा लगाते हुए गाँव की उन्नति के साथ अपने अपने परिवार की सलामती की मन्नत मानते है।।

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